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  • जाने क्यों मैं देता हूं शब्द अपनी भावनाओं को

    जाने क्यों मैं देता हूं शब्द अपनी भावनाओं को   मैं रोक देता हूं उस धार को जो बहती है बेधड़क.. उन्मुक्त..शब्द नहीं मिलते हर सोच को फिर शब्द में डालने के लिए मैं सोच बदल देता हूं।मैं मूर्त करना चाहता हूं अपने हर एहसास को जो सांसों की तरह चलती रहती है अनवरत.. बिना

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