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  • जाने क्यों मैं देता हूं शब्द अपनी भावनाओं को

    जाने क्यों मैं देता हूं शब्द अपनी भावनाओं को   मैं रोक देता हूं उस धार को जो बहती है बेधड़क.. उन्मुक्त..शब्द नहीं मिलते हर सोच को फिर शब्द में डालने के लिए मैं सोच बदल देता हूं।मैं मूर्त करना चाहता हूं अपने हर एहसास को जो सांसों की तरह चलती रहती है अनवरत.. बिना

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  • अच्छा लगता है..

    अच्छा लगता है.. ये शाम न जाए, कभी रात ना हो          उदासी-अंद्धेरे की बरसात ना हो हाँ ले चल मुझे कहीं साथ अपने, जहाँ बंदिशों की कोई बात ना हो वो रोना, वो गाना, सताना, मानना, करें जब जो चाहें,जो दिल ने ठाना, बहें धार में हम अपने ही दिल के,

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