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जाने क्यों मैं देता हूं शब्द अपनी भावनाओं को

जाने क्यों मैं देता हूं शब्द अपनी भावनाओं को

 

मैं रोक देता हूं उस धार को

जो बहती है बेधड़क.. उन्मुक्त..शब्द नहीं मिलते हर सोच को

फिर शब्द में डालने के लिए मैं सोच बदल देता हूं।मैं मूर्त करना चाहता हूं अपने हर एहसास को

जो सांसों की तरह चलती रहती है

अनवरत.. बिना मेहनत के..बांधने के क्रम मैं रुक जाती है वह धार

जो शायद विषाद की सीमा लांघ

खुशी की तरफ बढ़ जाती

और अपने ख्यालों में डूबा दुखी मैं

शायद खुश भी हो जाता!

लेकिन अब शब्दों के जाल में घिरे मेरे एहसास
दुख का प्रयाय बन के रह गए हैं..

जाने क्यों मैं देता हूं शब्द अपनी भावनाओं को!  

 

 

 

 

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One thought on “जाने क्यों मैं देता हूं शब्द अपनी भावनाओं को

  • April 26, 2017 at 3:44 am
    Permalink

    Il porta occchiali che avevo, dopo assomigli a Betotntrii invece che a Tonino. Ma non lo venderai mai ci tengo troppo. Adesso ho un porta cellulare ti può servire?

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